Monday, April 28, 2014

अब तो मुझको उड़ जाने दो ...


कुछ वर्षों के बाद हुआ है ,
मन थोड़ा आज़ाद हुआ है ...
फिर आसमान जुड़ जाने दो,
अब तो मुझको उड़ जाने दो,
अब ना मुझको तुम दाने दो ...
बस अपने सपनों को पाने दो,
अब मुझको उड़ जाने दो ...
मैं देव नहीं बन पाउँगा,
पर मुझको दानव ना बन जाने दो ...
ना करुण रहे मेरे मन में,
ऐसा मानव ना बन जाने दो ...
आशायें स्वच्छन्द रहें,
मेरी मुट्ठी बंद रहे...
पर धीरे धीरे आशाओं में ,
थोड़े अंकुर तो आने दो ...
मन ही मन बुन जाने दो ,
अपने सपनों को पाने दो ...
हरी शाख, लहराते पत्ते
मुझको भी बहुत लुभाते हैं ...
घने वृक्ष और संगी साथ,
मुझको सदा बुलाते हैं ...
पर मुझको मोह ना आने दो ,
गगन-स्पर्श पा जाने दो,
अपने पर फैलाने दो ,
अब तो मुझको उड़ जाने दो ...

सेल्फी ...


थोड़ा सा हँस देंगे हम,
और थोड़ा सा शरमाएंगे,
फिर 'सेल्फी' वाले पिक पे जब,
अपने हन्ड्रेड लाइक्स आयेंगे ,
फिर हम भी डॉक्टर इंजिनियर से,
सेलेब्रिटी बन जायेंगे ...

अपने को लोग 'वॉव' कहेँगे,
शोहरत ऐसी पायेंगे ,
अपना स्टेटस चेंज हुआ जो,
FB पे छा जायेंगे,
हम भी फिर कन्फ्यूज़्ड लवर से,
सेलेब्रिटी बन जायेंगे ...

घर में चाहे मारा-मारी,
किसी से बात नहीं कर पायेंगे ,
पर लिखेंगे FB पे हम ,
सहानुभूति फिर पायेंगे,
हम भी फिर बीवी शौहर से,
सेलेब्रिटी बन जायेंगे ...

ऑफीस का हो काम भले ना,
बॉस से डंडे खायेंगे ,
जब अपनी नहीं सुने फिर कोई,
गम के आँसूं पी जायेंगे,
पर टाइम मिले जैसे फिर हमको,
FB पे बॉस बजायेंगे ,
फिर हम भी फ्रस्टरेटेड एम्पलोयी से,
सेलेब्रिटी बन जायेंगे ...

राजनीति का पता नहीं कुछ ,
पर अपनी टांग अड़ायेंगे,
AC रूम में बैठे बैठे ,
FB पे आलोचक बन जायेंगे,
मोदी राहुल AK की फिर,
जम के खूब लगायेंगे ,
फिर हम भी सिंपल वोटर से ,
सेलेब्रिटी बन जायेंगे ...

फिर 'सेल्फी' वाले पिक पे जब,
अपने हन्ड्रेड लाइक्स आयेंगे ,
फिर हम भी डॉक्टर इंजिनियर से,
सेलेब्रिटी बन जायेंगे ...


बेटा तुमसे ना हो पायेगा ...


कॉलेज खतम हुआ नहीं की,
बाबूजी सिर चढ़ कर बोले,
अब तुम सीना तान खड़े हो,
और जिम्मेदारी के झेलो गोले,

हमने कहा पिताजी देखो,
हम हैं थोड़े अलग किस्म के,
बड़े बड़ों से टक्कर लेंगे,
खूब पिलायेंगे हम पानी,
और कुछ सालों में अपने पीछे ,
होंगे टाटा और अंबानी

उनकी मुख खुली रह गयी,
फिर धीरे से ऐनक खोले,
बेटा भांग चढ़ गयी क्या ?
जा अब थोड़ा सा सो तू सो ले ...

तूने सोच लिया भी कैसे,
अब टाटा तेरे गुण गायेगा ...
और अपने घर के बाहर तू ,
अंबानी को पायेगा ...

पगले ऐसा बोल के तू क्या ...
आंखों में आँसू लायेगा ,
तुझको ले कर बड़े स्वप्न थे,
इक दिन सरकारी दफ्तर में तू,
हेड-क्लर्क की तख्ती पायेगा,
पर सुन कर तेरी चिकनी बातें ,
अब मुझको ये समझ आ गया,
बेटा तुमसे ना हो पायेगा ...
बेटा तुमसे ना हो पायेगा ...

अब माँ ने फिर राग अलापा,
पापा तो यूं ही कहते हैं ,
मैं कहती हू कॉलेज में तू,
हर कोर्स में इक्का पायेगा ,
मेरा लाल बड़ा होकर,
बिल गेट्स से आगे आयेगा ...

सुनकर माँ की ऐसी बातें,
आँखों ने ये दृश्य घुमाया,
चौथी बार मा १२० में,
मुश्किल से ही डिक्का पाया ,
ए-टी कुण्डू पूछो ही मत,
उनको ऑडिट विथ्ड्राव करवाया ...

अब माँ बेटे का प्यार देखकर ,
बाबूजी थोड़ा घबराये ,
हमको लगा सही वक़्त पर,
माँ ने अपने झंडे फ़हराए ....

फिर माँ ने कुछ ऐसा पूछा,
हमको बड़े पसीने आये ...

माँ ने बोला शादी कर ले,
बेटा अब तू बड़ा हो गया,
सूंघ गया फिर साँप मुझे,
रोआँ रोआँ खड़ा हो गया ...

मैने कहा हे मम्मी तुमको,
ये अकस्मात् क्या कीड़ा आया,
पल दो पल में तुमने मुझको,
गेट्स से बीवी-नौकर बनवाया ...
मैं पका आम नहीं कच्चा हूं,
उम्र हो गयी ३५ पर,
मैं तो छोटा सा बच्चा हूं,
मैं तो ऐसे ही अच्छा हूं ...

मैं समझ गयी बेटा अब तुमको,
अब क्या मेरी भी सुनता जायेगा ?
घर अबकी जो आये मार्क्‍स फिर ,
तू छिपा नहीं फिर पायेगा ...
अबकी बार कहीं रहे तू,
पाप नहीं धो पायेगा,
बेटा तुमसे ना हो पायेगा ...
बेटा तुमसे ना हो पायेगा ...


Sunday, April 14, 2013

इस सोच में बैठा हूँ मैं कब से ...

क्या मेरा क्षण-भंगुर दुस्साहस ,
हर आज में यूँ ही खड़ा रहेगा ?
कठपुतली सा मूक हमेशा ?

अपनी रोटी के ताने-बाने में ...
जाने किस झूठ बहाने में ....?

या फिर मुट्ठी भींच यह साहस ...
सच्ची मर्यादा हित लड़ा करेगा ...

इस सोच में बैठा हूँ मैं कब से ...
कल से कितना कुछ करना जीवन में ...
पर कल क्या फिर मुझको वक़्त मिलेगा ???

यह कायरता की धुंध घनी है ...
पर मैं क्यूँ तुमको दोषी ठहराऊँ ...
मैं खुद भी तो परिवर्तन को बढ़ सकता था ...
और आने वाली हर बाधा से ...
सहिष्णुता से लड़ सकता था ...

पर मैं रुक रहा जाने किस कल तक ...???

इस सोच में बैठा हूँ मैं कब से ...
कल से कितना कुछ करना जीवन में ...
पर कल क्या फिर मुझको वक़्त मिलेगा ... ?

Saturday, April 13, 2013

मैं क्यूँ न द्वेष त्याग दूं ...



ये युद्ध न कोई छल प्रपंच है,
हे अर्जुन; बस ये रंगमंच है ...
नश्वर शरीर आधा गुलाल है ...
बस पृष्ठ-भूमि का रंग लाल है ...

भरी सभा में हो गया,
जब द्रौपदी का चीर,
खड़ा रहा तू देखता,
बता तू किस तरह का वीर ?
क्यूँ फटी नहीं धरा तेरी ...
क्यूँ न फैला रक्ताबीर ?
तू भी मौन देखता रहा,
हुआ तू क्यूँ नहीं अधीर ?
पार्थ! बता तू किस तरह का वीर ???

ना मिलेंगे वृक्ष-छाँव में,
हो वीर जिन दिशाओं में,
जो धूल धूल हो शरीर,
वहीँ तो बन गया है वीर ...

ये न सोच अब कहीं,
की शत्रु मेरा भाई है ...
भाग्य में यहीं लिखा,
कि ये धर्म की लड़ाई है ...

बाण भेद दे शरीर,
आत्मा ना होगी चीर,
ये चिता तो देह-भस्म है ...
यहीं तो प्रकृति का रस्म है ...

-कृष्ण

मैं कैसे गांडीव उठाउँगा
सबको छलनी कर जाउँगा
क्या बल से ही परिणाम-विजय होगा ?
या छल से भी वध-निर्णय होगा ?

ये युद्ध जीत भी गया,
तो सबको हार जाऊँगा ...
जो कटा यह वंश-वृक्ष तो...
किसकी छाँव पाऊँगा ???

क्यूँ धर्म-नाम युद्ध हो,
क्यूँ भूमि फिर से क्रुद्ध हो ?
मैं क्यूँ धरा को दाग दूं ?
मैं क्यूँ न द्वेष त्याग दूं ...

घनी है धुंध राह में,
की दृष्टि दूर तक गडी ...
जब रक्त हर कराह में ,
फिर तेरी ये सृष्टि क्यूं खड़ी ?

है कौरवों का रक्त ये ,
पर रक्त क्यूं बहे हरि ?
क्या फर्क होगा लाल में ...
जब लाल हो धरा पड़ी ?

मैं थक गया कराह से,
गुलाल के प्रवाह से ..
मैं क्यूँ चिता को आग दूं ?
मैं क्यूँ न बाण त्याग दूं ...

मैं विध्वंस त्याग दूं 'हरि'
फिर धरा हो स्वर्ग से बड़ी,
मैं क्यूँ धरा को दाग दूं ?
मैं क्यूँ न द्वेष त्याग दूं ...

-अर्जुन

Thursday, October 18, 2012

जब फिर स्वराज निर्णय होगा ...


रोटी के भूख की मारी है,
ये जनता जुल्म से हारी है,
जब जिद्द पे अड़ जाए शासक,
समझो तख़्त-पलट की बारी है ...

जो इनकी तो मनमानी है,
तो हमने भी हठ पे ठानी है,
चाहे छलनी हो जाएँ मगर,
फिर से तहरीर बनानी है ...

फिर वात-वृक्ष जड़ से हिल जाए,
जब चाकू की धार सजेगी,
फिर होगा श्रृंगार लहू से,
जब बारूदी बन्दूक बजेगी ...

फिर होगा न फेर-बदल हिस्सों का
फिर होगी न भूमि अष्ट-भाग,
फिर इन्द्र-धनुष उदय होगा,
जब फिर स्वराज निर्णय होगा ...

Saturday, September 08, 2012

तू जो रंगमंच में खड़ा ...


तेरी लालिमा सी रंग हो,
तेरा बज रहा मृदंग हो,
तू चीरता हर ध्यान हो,
तेरी वीरता अभिज्ञान हो ...

तू ना विश्वामित्र है,
ये कौन सा चरित्र है,
तू कर्ण धर्मयुद्ध में,
धवल सी हार-चित्र है ...

शत्रु भले सशस्त्र हो,
पर तुझमें भी चंडी-रक्त हो,
तू चेतना में डाल चीख,
तू वेदना को पाल औ सीख ...

तू जो रंगमंच में खड़ा,
और इम्तिहान हो कडा...
तू सिंह की दहाड़ रख,
तू सब्र का पहाड़ रख ...
तू सिंह की दहाड़ रख,
तू सब्र का पहाड़ रख ...

Monday, January 16, 2012

हार जीत अब प्रश्न नहीं है ...


हार जीत अब प्रश्न नहीं है, प्रश्न नहीं तेरी अभिलाषा ...
प्रश्न नहीं मेरा यह चिंतन, प्रश्न नहीं अब कोई ज़रा सा ...
तुम अर्धसत्य , तुम विवरण मेरे ,तुम मेरी ही संरचना हो ...
तुम दर्द कहीं, मुस्कान नहीं, तुम कहीं व्यूह की रचना हो ...

तुम काल कहीं, तुम रूप कहीं ; कहीं पे तुम खुद मौलिकता हो ,
ब्रह्म कहीं, ब्रह्माण्ड कहीं तुम ; तुम कहीं पे नन्ही सी कविता हो ,
कहीं अणु हो, कहीं अनुशाशन ; कहीं छंद हो, कहीं नाद तुम ,
कहीं नीर तुम , कहीं हो ज्वाला ; कहीं जन्म तुम, कहीं चिता हो !

तेरा प्रश्न पता करने को, जाने क्या क्या मंज़र देखा ...
कुछ आँखों में तपती गर्मी, कुछ आँखों में खंजर देखा ...
कुछ में देखा अक्स तुम्हारा, कुछ में चुप्पी की इक भाषा ...
कुछ आँखों में रातें देखी, कुछ में देखी दिन की आशा ...
हार जीत अब प्रश्न नहीं है , प्रश्न नहीं तेरी अभिलाषा ...

Thursday, December 29, 2011

ये वक़्त ना हंसने गाने का ...


ये वक़्त ना हंसने गाने का,
ये क्षण तो खून बहाने का ...
संग्राम खड़ा सरहाने मेरे ...
इक मुट्ठी रक्त नहाने का ...

नभ-नक्षत्र नाप में लाने का ...
फिर क्षितिज लांघ के जाने का...
फिर से त्रिशंकु बरसाने का ..
खुद पृथक राह बन जाने का
फिर शत्रु-बल हथियाने का ,
हिम की छोटी पिघलाने का,
और चहुँ ओर छा जाने का ,
फिर उत्प्लावन में बह जाने का ..
खुद को आहुत कर जाने का ..
फिर रण-कौशल दिखलाने का ..
फिर चाणक्य-नीति अपनाने का ...

जब शत्रु से शब्द ना आने का ...
तो मस्तक दांव लगाने का ..
फिर अग्नि-सिन्दूर उठाने का ...
फिर से वर्चस्व मिटाने का ...
फिर से त्रिशंकु बरसाने का ..
खुद पृथक राह बन जाने का ..

Monday, December 26, 2011

रिसते हुए रक्त ने पूछा ...


रिसते हुए रक्त ने पूछा, ये क्या युद्ध की भाषा है ..
कटे लाख सर बिन कारण के, पर बढती और पिपासा है ...
कहा वक़्त ने हँसते हँसते , ये हर युग की परिभाषा है ...
हर युग में यह होता लेकिन, ये भी खूब तमाशा है ...

इक युग में देखा कलिंगा, इक युग में रामायण देखा ,
इक में देखा छत्रपति तो, इक युग में नारायण देखा ,
सतयुग आया, देखा अर्जुन; इक एकलव्य भी मैंने देखा ...
देखी मैंने मरती सांसें, लाल द्रव्य भी मैंने देखा ...

कहा वक़्त ने चुपके से फिर, तू क्यूँ रोता लहू मगर है,
गर शरीर में दर्द छिपा है , थोड़ी भी सच्चाई अगर है ,
आएगा इक दिन ऐसा भी ; जब वो खुद में ही रह जाएगा,
जो बहा रहा वो दरिया तेरा, फिर खुद उसमे ही बह जाएगा,
फिर सोचेगा क्या पाया उसने ; युद्ध की क्या कुछ परिभाषा है ..
हर युग में ये होता लेकिन, ये भी खूब तमाशा है ...

मानव तुमको इतिहास रचाना है ...


मानव तुमको इतिहास बनाना है,
सूखे पत्तों और काटों पे चलकर जाना है ...

विश्राम मिले न तुमको ; पर विश्वास दिखाना है ...
पर्वत कितना भी ऊंचा हो, सागर कितना भी गहरा हो,
खुद को इक आस बंधाना है, इक श्वास में जाना है ....
मानव तुमको इतिहास बनाना है ...

कोई न रहे लाठी बन कर; कोई न रहे साथी बन कर ..
पर लगे कहीं भी आग मगर, इक फूँक बुझाना है ..
हिम की छोटी पर रहो अडिग, या हिंद महासागर में स्थित,
ये भूल न जाना की तुमको धरती का क़र्ज़ चुकाना है ...
मानव तुमको इतिहास बनाना है ...

है कटा शीश , हो अर्धनग्न, पर फिर भी हाथ बढ़ाना है ..
अपने धरती को सींच रक्त, तुमको बलिदान चढ़ाना है ...
चाहे जोखिम में जान पड़े, चाहे तू मर्यादा लांघ परे,
पर प्रति-पल अपनी जननी की तुझको सिन्दूर बचाना है ..
मानव तुमको इतिहास बनाना है ...


मृग-मरीचिका का वक़्त नहीं , काटो तो कहीं भी रक्त नहीं ..
अपने अन्दर के रावण में , फिर तुमको राम जगाना है ...
मानव तुमको इतिहास रचाना है ....

सिंह-नाद करे कोई रण में ...

सिंह-नाद करे कोई रण में, रण में कोई हुंकार करे ...
हर शीश गिरे धरती पर; जब शत्रु मर्यादा पार करे ...
जीत सके न मन को तो , तन पे ही सौ सौ वार करे ...
इक जीत तुम्हारी हो कर भी, यह जीत तुम्हारी हार करे ...

हो सजा फर्श पे अस्त्र-शस्त्र, और इक दीपक-थाल पड़ा ..
मस्तक में हो रक्त जड़ा , और मुट्ठी में लाल पड़ा ...
पौरुष से फिर फूटी धरती , फिर पूरा आकाश खड़ा ...
रक्त स्वेद से लथपथ ; फिर भी अर्जुन अविनाश अड़ा ...
यह हार जीत का निश्चय फिर, हो जाए विकराल बड़ा ...
क्या विजय-तिलक भावार्थ यहीं, कि चहुँ ओर कंकाल पड़ा ...

जो मिट्टी पे अधिकार करे, क्या मन पे भी अधिकार करे ...
बल से शरीर झुक जाए पर, मन क्यूँ शत्रु स्वीकार करे ...
छल से प्रेरित जो देव कहीं , मन उसको भी अविकार करे ...
है बड़ा विषम यह युद्ध पितामह, यह युद्ध ह्रदय पे भार करे ..

जो मिट्टी पे अधिकार करे, क्या मन पे भी अधिकार करे ...
बल से शरीर झुक जाए पर, मन क्यूँ शत्रु स्वीकार करे ...

Wednesday, December 30, 2009

तुम बिन जाने किन चिन्हों से ...


तुम बिन जाने किन चिन्हों से , अपना मन बहलाऊँगा ...
तुम से ही तो अब तक मैं , जाना जाता हूँ दुनिया में ....
तुम जाओगे फिर ना जाने , मैं खुद को क्या कहलाऊँगा ...
कुछ शब्द कहूँगा तुम से मैं , दो हाथ बढ़ेंगे जोकर से ...
फिर अपने इक करतब से तुमको , मैं तुमको यूँ सहलाऊँगा ...
फिर तेरे हाथों की रेखाओं से , मैं दर्द तुम्हारा खींचूंगा ...
फिर सतरंगी पिचकारी से, मैं तुमको यूँ नहलाऊँगा ...

फिर एक सदी जो बीतेगी , तुम बिन फिर चौराहे पर ...
फिर लोग कहेंगे जाने क्यूँ , उस लाल हवेली में अक्सर ...
देखा हमने दर्द पनपते , फिर देखा दर्द दोराहे पर ...
फिर लोग कहेंगे जाने क्यूँ , वो शख्स अकेला दिखता है ...
फिर एक कटोरी नज़र के बिन मैं , फिर जोकर कहलाऊँगा ...
फिर अपने करतब से खुद को , बस खुद को ही सहलाऊँगा ...
तुम जाओगे फिर ना जाने , तुम बिन क्या कहलाऊँगा ...

Tuesday, November 24, 2009

अत्याचारी झुंड हो ...

अत्याचारी झुंड हो , फिर भी तुझे घमंड हो ...
कि लड़ पड़ेगा तू कि जब भी मृत्यु-दंड हो ...

अश्रु-धार यूँ गिरे , स्वर्ण-भाग्य यूँ फिरे ,
कि जैसे राम का भी रावण समान हाल हो ...
निकल पड़ा है रण में तू, कि अस्त्र शस्त्र ढाल हो ,
जो गिरे धरा पे नीर ,तो फिर लाल सा गुलाल हो ..
जो व्यूह चीर दे तुझे, उसकी भी क्या मजाल हो ...
रंगित हुए तेरी आत्मा , भंगित हुए तेरी साधना ,
पर ध्यान यूँ रहे धवल, कि जैसे सीध में कपाल हो ...

आये शूल राह में , पड़े धूल निगाह में ...
अचल चलेगा तू, कि चाहे हिम समान ठण्ड हो ...
सोच मर पड़े, कि चाहे रक्त सड़ पड़े ,
कोशिश करेगा तू , कि जैसे शिव समाँ प्रचंड हो ...
जीत की फिर चाह में , तू खुद से ही क्यूँ न लड़ पड़े ...
अखिल रहेगा तू कि जैसे विष्णु सम अखंड हो ...


अत्याचारी झुंड हो , फिर भी तुझे घमंड हो ...
कि लड़ पड़ेगा तू कि जब भी मृत्यु-दंड हो ..
अखिल रहेगा तू कि जैसे विष्णु सम अखंड हो ...